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आमची मुम्बई !

मुम्बई की घटनाओं ने हमारी मानसिकता पर एक गहरा घाव किया है। शरीर के ज़ख्म तो समय के साथ भर जाएंगे पर दिल पर लगी चोट को भरने में, अगर सदियों नहीं तो, बरसों ज़रूर लग जाएंगे। निर्दोषों की जान लेने वालों की कोई जाति या धर्म नहीं है। वे मनुष्य के भेस में खूनी दरिंदों के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं। उनकी जाति नपुंसकों की है और उनका धर्म वहशियों का। हिंसा किसी मर्ज़ की दवा नहीं है न ही किसी प्रश्न का उत्तर -- चाहे वो धार्मिक/आध्यात्मिक हो या सामाजिक/राजनैतिक।

लेकिन जब तक भोले-भले लोगों को बहसाकर खूनी दरिंदों में बदलने वालों के ख़िलाफ़ एक खुली जंग का ऐलान न किया जाएगा, मुम्बई जैसी घटनाओं का कोई अंत मुझे नज़र नहीं दिखाई देता हैं। इस वहाशिपने को सर झुका कर सहने, नज़र अन्दाज़ कराने, और बढ़ावा देने वाला समाज भी इस कत्ले-आम का उतना ही उत्तरदायी हैं जितना ये कातिल -- खास तौर पर तथाकथित प्रगतिशील वामपपंथी इन्टेलिजेन्सिया जो इस खुले आम दरिंदगी को भांति-भाँती नामों और व्याख्याओं से समझाने की कोशिश कर रहे हैं.
पहाडों के पास जाने पर अपनी क्षुद्रता का अहसास होता है, अपनी क्षण-भंगुरता का अहसास होता है। ये ऊंचे पहाड़ न जाने कब से खड़े हैं अपनी जगह पर और न जाने क्या-क्या नहीं देखा इन्होंने। कितने मौसम बदले, कितनी आंधियां और बरसातें आयीं, कितने लम्हे गुज़रे? कितनी बार धरती अपने अक्ष पर घूमी और कितनी बार चाँद ने बादलों से अठखेलियाँ खेलीं? पर ये पहाड़ आज भी वहीं खड़े हैं -- चुप-चाप, गुमसुम, शांत।

ये बेजान से दिखाने वाले पत्थर क्या नहीं बोलते. ये ऊंचे पहाड़ अपने दामन में न जाने कितने राज़ छिपाये रहते हैं इनकी मोटी परतों में न जाने कितने रहस्य, कितनी कहानियाँ छिपी पडी हैं। कोई इनसे पूछे तो सही!

पहला ब्लॉग

बहुत दिनों से ब्लॉग की दुनियाँ में गोता लगाने की इच्छा अपने दिल में पाल राखी थी। परन्तु इस इच्छा को साकार कराने का मौका आज ही मिला। देर आए पर दुरुस्त तो आए! मेरी कोशिश रहेगी कि यदा-कदा ही सही पर नियमित रूप से अपने विचारों को यहाँ सबके सामने रखूँ.