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Showing posts from 2010

माजी के पन्नों से

१. कोशिश एक ग़ज़ल की
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यह दिल मेरा चाहत तेरी का दीवाना है
ये सोच मत यह सच नहीं अफसाना है.

दिल को तू मेरे देख न जाओ औरों पर
तुमने अब तलक मुझको नहीं पहचाना है.

है जकड़ा कई मजबूरियों में यह बेचारा दिल
समझ लिया तुमने कि यह बेगाना है.

जाओ जलाते शमाँ को तुम प्यार की निरंतर
जलने को आएगा चला खींचा कि यह परवाना है.

मदहोश हूँ पी के पड़ा मैं प्यार की माय को
साकी है तू, प्याला है तू, और तू ही मयखाना है

हूँ मैं तेरा, है मेरी तू, ये ऐलान ऐ खुदाया
एक मैं हूँ और तू है, बाकी ये जालिम ज़माना है.

बस ऐ जानेमन, तू कर यकीं मुझपर
अपनी तो इस बेदाग वफाई को बस जताना है.

२. फिलहाल बिना शीर्षक
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आ जाओ मेरी बांहों में ओ जानेमन
तुम्हें अपनी प्रेयसी बनायेंगे सनम.

घूमेंगे हसीन वादियों में
बागों में, पहाड़ियों में
चट्टानों पर नदी किनारे
बैठ पक्षियों का
मधुर संगीत सुनेंगे हम.

सरताज होगा फूलों का
करधनी होगी मूँगों का
और तेरे लंहगे को
पत्तियों से मेंहदी के
काढ़ के सजायेंगे हम.

स्वीकारों इन उपहारों को
मत हँस टालो मन उद्गारों को
बनो प्रियतम मेरी साथ रहो तो
दर्…

पुखराज

गुलज़ार साहब की शायरी का कायल मैं बचपन से रहा हूँ. पर जब मेरी पिछली भारत यात्रा के दौरान उनकी ‘पुखराज’, हिन्दी, रूपा एंड कंपनी, २००९ तृतीय संस्करण, की प्रति मेरे हाथ लगी तो मेरी खुशी का कोइ ठिकाना न रहा. दिल्ली की कुहासों भरी सर्द सुबहों और दिल्ली से शिकागो की सोलह घंटे की लंबी, उबाऊ, और तल्खी भरी अमेरिकन एयरलाइन्स की उड़ान के बीच जो लमहे पुखराज की आगोश में गुजरे, वो बड़े खुशनुमा और तसल्ली भरे साबित हुए.

गुलज़ार साहब के फिल्मी गीतों, संवादों, पटकथा, और उनकी बुलंद, शायराना आवाज़ –जिसका कोई सानी नहीं है, से हम सब एक अरसे से वाकिफ रहे हैं. आप सब निम्नलिखित रचना, वादा (पृष्ठ ६७) को आसानी से पहचान लेंगे

मुझसे इक नज़्म का वादा है, मिलेगी मुझको
डूबती रातों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द-सा चेहरा लिए चाँद उफक पर पहुंचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
न अन्धेरा, न उजाला हो, न ये रात न दिन

जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आये
मुझसे इक नज़्म का वादा है, मिलेगी मुझको

पर पुखराज में उनकी एक अनोखी ही छवि सामने आती है. उनकी शायरी गहरी होते हुए भी हर किसी के दिल को छूती है. उ…

हादसा

अंधेरी रात में दबे पाँव किसी ने
पलीते में आग लगा दी .
टूटी खिड़कियाँ, सूने दरीचे
गुमनाम गलियाँ, पथरीली राहें.
हर कोना, हर लम्हा
तबाही और मातम का माहौल.
सीने में खलिश, होठों पे प्यास
आँखों में जलन, दिल में अंगार
जज्बातों का गुबार फूटा
आँसुओं का सैलाब उमड़ पडा.
और दिलों के ज़ख्म फिर से हरे हो उठे.

टूटी खिडकियों के टुकड़ों को समेटने की कोशिश की
तो हाथ लहू-लुहान हो गए.
चारदीवारी नापने की कोशिश की
तो पैरों में छाले पड़ गए.
पसीना पोंछा
तो खून की बूँदें टपक पडीं.
बाजू में झाँका
तो लोग नए थे.
अपना अक्स आईने में देखा
तो चेहरा बदल गया था.

भौचक नींद खुली और जगा मैं.
हादसों की बस्ती में एक और हादसा हुआ.