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शब्द प्राण मुझे दिए तन में स्पर्श तेरा मैं कर पाऊँ अनुभव ... अधरामृत पीकर-चखकर संपर्क तुम्हारा, हे प्रियतमा! सानिग्ध्य -- दैहिक, लौकिक, और अलौकिक झंकृत हो उठे कंठ तार जिह्वा पर भी आई बहार दंत अधर भी हुए स्फुट पर हाय! शब्द नहीं मिले मुझको शब्द नहीं मिले मुझको॥ अवतंस कुमार, १४ मई २००९, क्रिस्टल लेक, इलिनॉय

ग़ज़ल

यह दिल मेरा चाहत तेरी का दीवाना है तू सोच मत यह सच नहीं अफ़साना है। दिल को तू मेरे देख न जा औरों पर मुझे नहीं अब तलक तूने पहचाना है। है जकड़ा मजबूरियों में कई यह बेचारा दिल समझ लिया तुमने की यह बेगाना है। जाओ जलाते शमां को तुम प्यार की निरंतर जलने को आएगा चला खींचा की यह परवाना है। मदहोश हूँ पीके पड़ा मैं प्यार की मय को साकी है तू, प्याला है तू, और तू ही मयखाना है। हूँ तेरा मैं, मेरी है तू - ये ऐलान ओ खुदाया एक हूँ मैं और तू है बाकी यह जालिम ज़माना है। बस, ऐ जानेमन! तू कर यकीन मुझपर अपनी तो बेदाग़ वफाई को बस जताना है। - अवतंस कुमार, ९ मई २००९। क्रिस्टल लेक, इलिनॉय
फासला ख़्वाबों से निकल के रूबरू आओ तो जान लें तनहा मुझको छोड़ के जाओ तो जान लें। चांदनी बन धुप में छाओ तो जान लें प्यास मेरे दिल की बुझाओ तो जान लें। तस्कीन-ओ-करार दिल को दिलाओ तो जान लें शमन 'गर प्यार की जलाओ तो जान लें। बादलों को जुल्फ की हटाओ तो जान लें जलवा-ऐ-हुस्न दिखाओ तो जान लें। दूर हो क्यूं पास तुम आओ तो जान लें फासला नज़रों का मिटाओ तो जान लें। दूर से इशारे तुम क्यूँ तुम करती हो सितमगर हमसफ़र बन के साथ निभाओ तो जान लें. -- अवतंस कुमार ०१//०८/२००९ चाहत बिखरे आशियाने के तिनकों को संजोया था बरसों जतन से । जबसे देखा है उनको जीने की चाहत बढ़ गयी और तिनक फिर सिमटने लगे नए आशियाने के शक्ल में । -- अवतंस कुमार ०१/०८/२००९

आमची मुम्बई !

मुम्बई की घटनाओं ने हमारी मानसिकता पर एक गहरा घाव किया है। शरीर के ज़ख्म तो समय के साथ भर जाएंगे पर दिल पर लगी चोट को भरने में, अगर सदियों नहीं तो, बरसों ज़रूर लग जाएंगे। निर्दोषों की जान लेने वालों की कोई जाति या धर्म नहीं है। वे मनुष्य के भेस में खूनी दरिंदों के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं। उनकी जाति नपुंसकों की है और उनका धर्म वहशियों का। हिंसा किसी मर्ज़ की दवा नहीं है न ही किसी प्रश्न का उत्तर -- चाहे वो धार्मिक/आध्यात्मिक हो या सामाजिक/राजनैतिक। लेकिन जब तक भोले-भले लोगों को बहसाकर खूनी दरिंदों में बदलने वालों के ख़िलाफ़ एक खुली जंग का ऐलान न किया जाएगा, मुम्बई जैसी घटनाओं का कोई अंत मुझे नज़र नहीं दिखाई देता हैं। इस वहाशिपने को सर झुका कर सहने, नज़र अन्दाज़ कराने, और बढ़ावा देने वाला समाज भी इस कत्ले-आम का उतना ही उत्तरदायी हैं जितना ये कातिल -- खास तौर पर तथाकथित प्रगतिशील वामपपंथी इन्टेलिजेन्सिया जो इस खुले आम दरिंदगी को भांति-भाँती नामों और व्याख्याओं से समझाने की कोशिश कर रहे हैं.

पहला ब्लॉग

बहुत दिनों से ब्लॉग की दुनियाँ में गोता लगाने की इच्छा अपने दिल में पाल राखी थी। परन्तु इस इच्छा को साकार कराने का मौका आज ही मिला। देर आए पर दुरुस्त तो आए! मेरी कोशिश रहेगी कि यदा-कदा ही सही पर नियमित रूप से अपने विचारों को यहाँ सबके सामने रखूँ.