सपने ******** सपने तो बस सपने होते हैं। सपने कभी मरते नहीं खुली आँखों के सपने और नींद के सपने खिड़की से चाँद तक छलांगों के सपने मुट्ठी में बादलों को खींचने के सपने। सपनों का क़ानून नहीं, सपनों का दारोगा नहीं सपनों की नैया नहीं, सपनों का साहिल नहीं सपनों की सरहद नही, सपनों का वीज़ा भी नही। सपने उम्मीदों की आंच में पिघल कर साँचों में ढलते हैं सपने नया रूप धरते हैं, नए लिबास पहनते हैं सपने तो बस सपने होते हैं सपने कभी मरते नहीं। - अवतंस
शब्द प्राण मुझे दिए तन में स्पर्श तेरा मैं कर पाऊँ अनुभव ... अधरामृत पीकर-चखकर संपर्क तुम्हारा, हे प्रियतमा! सानिग्ध्य -- दैहिक, लौकिक, और अलौकिक झंकृत हो उठे कंठ तार जिह्वा पर भी आई बहार दंत अधर भी हुए स्फुट पर हाय! शब्द नहीं मिले मुझको शब्द नहीं मिले मुझको॥ अवतंस कुमार, १४ मई २००९, क्रिस्टल लेक, इलिनॉय
सदियों पहले आए थे लुटेरे वहशी, दरिंदे आँखों में हैवानियत लिए और हाथों में तलवार एक पुस्तक और एक रसूल के नुमाइंदे। हज़ारों मंदिरें तोड़ीं रौंदा हमारे देवी-देवताओं को अपने पैरों तले। गजवा-ए-हिंद नारा था, इरादा था काफ़िरों की धरती को ‘पाक’ बनाने का। कल भी लुटेरे आए थे स्वामी अय्यप्पा का ब्रह्मचर्य तोड़ने उनके मंदिर को नापाक करने हमारे मान-स्वाभिमान का गला घोंटने हमारी भक्ति और आस्था को अपने पैरों तले कुचलने एक पुस्तक और एक रसूल के नुमाइंदे। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि सदियों पहले उनके परचम का रंग हरा था और कल रक्तिम लाल। ~अवतंस
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