शब्द प्राण मुझे दिए तन में स्पर्श तेरा मैं कर पाऊँ अनुभव ... अधरामृत पीकर-चखकर संपर्क तुम्हारा, हे प्रियतमा! सानिग्ध्य -- दैहिक, लौकिक, और अलौकिक झंकृत हो उठे कंठ तार जिह्वा पर भी आई बहार दंत अधर भी हुए स्फुट पर हाय! शब्द नहीं मिले मुझको शब्द नहीं मिले मुझको॥ अवतंस कुमार, १४ मई २००९, क्रिस्टल लेक, इलिनॉय
सपने ******** सपने तो बस सपने होते हैं। सपने कभी मरते नहीं खुली आँखों के सपने और नींद के सपने खिड़की से चाँद तक छलांगों के सपने मुट्ठी में बादलों को खींचने के सपने। सपनों का क़ानून नहीं, सपनों का दारोगा नहीं सपनों की नैया नहीं, सपनों का साहिल नहीं सपनों की सरहद नही, सपनों का वीज़ा भी नही। सपने उम्मीदों की आंच में पिघल कर साँचों में ढलते हैं सपने नया रूप धरते हैं, नए लिबास पहनते हैं सपने तो बस सपने होते हैं सपने कभी मरते नहीं। - अवतंस
बड़ी असमंजस में हूँ आज कि आख़िर सुनूँ तो किसकी सुनूँ एक तरफ़ आसमान के विस्तार में पेड़ों में अँटका कृष्णपक्षी प्रतिपदा का चाँद है दूसरी तरफ़ मदिरालय की रुनझुन और हाला से भरा प्याला बित्ते भर दूर मेज़ पर अपनी केहुनियों को टिकाए और अपनी दोनों हथेलियों में अपने बोझिल से चेहरे को थामे तुम वक्त ठहर सा गया था घड़ी भर को मैं जी सा गया था घड़ी भर को। (०१, वैशाख, कृष्ण पक्ष प्रतिपदा, विक्रम सम्वत् २०७७; अप्रैल ८, २०२०)
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