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Showing posts from April, 2008
पहाडों के पास जाने पर अपनी क्षुद्रता का अहसास होता है, अपनी क्षण-भंगुरता का अहसास होता है। ये ऊंचे पहाड़ न जाने कब से खड़े हैं अपनी जगह पर और न जाने क्या-क्या नहीं देखा इन्होंने। कितने मौसम बदले, कितनी आंधियां और बरसातें आयीं, कितने लम्हे गुज़रे? कितनी बार धरती अपने अक्ष पर घूमी और कितनी बार चाँद ने बादलों से अठखेलियाँ खेलीं? पर ये पहाड़ आज भी वहीं खड़े हैं -- चुप-चाप, गुमसुम, शांत।

ये बेजान से दिखाने वाले पत्थर क्या नहीं बोलते. ये ऊंचे पहाड़ अपने दामन में न जाने कितने राज़ छिपाये रहते हैं इनकी मोटी परतों में न जाने कितने रहस्य, कितनी कहानियाँ छिपी पडी हैं। कोई इनसे पूछे तो सही!