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अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा
------------------------ सावन का पहला-पहला ही दिन
काली अँधियारी रात में 
काले यमदूत समान बादल
आए उमड़-घुमड़ के
शंखनाद भी था, गर्जना भी
पूरा पहाड़ थर्रा उठा
बिजुरी सी भी चमकी
और घाटी में दूर-दूर तक फैल गयी
पर अबकी सावन में 
पानी की बूँदो के बदले
बारिश हुई बंदूक़ों के गोलियों की
राहत के बदले हताशा, अफ़रा-तफ़री
बम-भोले की गूँजों के बदले क्रंदन। कईयों के घरों में चूल्हा नहीं जलेगा आज
कईयों के हाथों की मेंहदी उतर गयी
कलाइयों की चूड़ियाँ, पैरों का अलता भी
किसी को माँ नहीं मिलेगी अब
किसी को उसकी बीवी, बहू, और बेटी। पर क़ाफ़िला कभी रुकता नहीं
यात्रा चिर-अनंत है
अंत के बाद पुनश्च
इस बात को बाबा भोलेनाथ से बेहतर
कौन जान या बता सकता है?
~अवतंस July 11, 2017

लोकनायक जय प्रकाश नारायण

लोकनायक जय प्रकाश नारायणआपात काल (जून २५, १९७५ – मार्च २१, १९७७) हटाए जाने की ४०वीं वर्षगाँठ पर विशेष
मन में बड़ी ललक थी।  साल भर बाद अपनी पत्नी और बिटिया के साथ पुनः अपनी जन्म-भूमि पटना जा रहा था।   सोलह घंटे की अंतर्राष्ट्रीय विमान यात्रा के बाद दिल्ली से पटना की पटना यात्रा को ले कर हम सबमें बहुत उत्साह था।  पर थकान अपना असर दिखा रही थी।  विमान की सीट से नीचे झाँकते-झाँकते न जाने कब झपकी आ गयी। “यात्री-गण कृपया ध्यान दें. कुछ ही क्षणों में हमारा विमान पटना के जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरने वाला है. आप अपनी सुरक्षा पेटी …” की घोषणा के साथ ही मेरी झपकी टूटी। विमान की खिड़की के बाहर देखा तो नीचे गंगा नदी का चाँदी सा पानी और महात्मा गांधी सेतु जनवरी की खुली धुप में चमक रहे थे। पलक झपकते ही हमारा विमान हवाई अड्डे पर खड़ा था। उतरने के लिए दरवाज़े से निकला तो बचपन की एक महत्वपूर्ण घटना मेरे जेहन में घूम गयी। मैं कोई नौ या दस वर्ष का रहा हूँगा उस वक्त। लोक नायक श्री जय प्रकाश नारायण अरसे के बाद पटना आने वाले थे। पूरे शहर में उत्साह का माहौल था। जत्था-का-जत्था हवाई अड्डे…